पचराव बना ‘नशे का गढ़’! शराब-गांजा खुलेआम, VIDEO वायरल चुनार थाना प्रभारी और पुलिसकर्मी इस काला कारोबार को रोकने में पूरी तरह नाकाम दिख रहे हैं
पचराव बना ‘नशे का गढ़’! शराब-गांजा खुलेआम, VIDEO वायरल चुनार थाना प्रभारी और पुलिसकर्मी इस काला कारोबार को रोकने में पूरी तरह नाकाम दिख रहे हैं
सीखड़,मीरजापुर। स्थानीय क्षेत्र अंतर्गत पचरॉव गांव से सामने आ रही खबरें कानून-व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर रही हैं। गांव में अवैध शराब , चरस और गांजा का कारोबार धड़ल्ले से चलने के आरोप हैं, और ग्रामीणों का कहना है कि यह कोई नई बात नहीं, बल्कि लंबे समय से जारी “खुला खेल” है।स्थानीय सूत्रों और ग्रामीणों के अनुसार, गांव में एक व्यक्ति द्वारा वर्षों से नशे का धंधा संचालित किया जा रहा है। हैरानी की बात यह बताई जा रही है कि वह कई बार जेल भी जा चुका है, लेकिन हर बार बाहर आते ही उसी कारोबार में फिर सक्रिय हो जाता है। ऐसे में ग्रामीणों के बीच यह चर्चा तेज है कि आखिर किसकी शह पर यह सिलसिला लगातार जारी है।ग्रामीणों का आरोप है कि बिना किसी “मजबूत सहारे” के इस तरह का अवैध कारोबार लंबे समय तक चल पाना मुश्किल है। इसी वजह से अब चुनार पुलिस की भूमिका को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन क्षेत्र में इसे लेकर आक्रोश बढ़ता जा रहा है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस नशे के जाल ने गांव के सामाजिक ढांचे को हिलाना शुरू कर दिया है। ग्रामीणों का कहना है कि बच्चे, युवा और यहां तक कि बुजुर्ग भी इस लत की गिरफ्त में आते जा रहे हैं। स्कूल जाने वाले किशोरों से लेकर मेहनतकश युवाओं तक, नशे का असर साफ दिखाई देने लगा है। इससे परिवारों में कलह, आर्थिक संकट और अपराध की आशंका भी बढ़ रही है।
मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब इस कथित अवैध कारोबार से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया। वीडियो में दिखाई जा रही गतिविधियों को लेकर गांव ही नहीं, आसपास के इलाकों में भी चर्चा तेज हो गई है। हालांकि आशंका बुलेटिन वीडियो की पुष्टि नहीं करता है।
ग्रामीणों का कहना है कि कई बार मौखिक रूप से शिकायत की गई, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। अब लोगों ने प्रशासन से लिखित शिकायत देकर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में हालात और भयावह हो सकते हैं।इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या स्थानीय स्तर पर निगरानी व्यवस्था कमजोर पड़ गई है, या फिर कहीं न कहीं जिम्मेदारी तय करने से बचा जा रहा है।