गुरू के नाम रूद्राक्ष का और मां के नाम चन्दन और आम का पौधा लगाया गया

राही मनवा दुःख की चिन्ता क्यों सताती है दुःख तो अपना साथी है:– बिचित्रानन्द
गुरू के नाम रूद्राक्ष का और मां के नाम चन्दन और आम का पौधा लगाया गया
सांसों का क्या भरोसा रूक जाय चलते चलते*
सीखड़ मीरजापुर। पचराॅव गांव में स्थित महर्षि ऋष्य ऋ॑ग सेवा संस्थान (पंजी) , नारायण गृहस्थ आश्रम नारायण नगर पचराव में गुरू पूर्णिमा महोत्सव पर्व का आयोजन किया गया।
जिसमें सर्व प़थम दसनाम जूना अखाड़ा के गढ़ मुक्तेश्वर के पीठाधीश्वर श्री श्री 1008 श्री जलेश्वरानन्द गिरी जी महाराज ऊर्फ जल वाले गुरु जी तथा प्रयागराज के पीठाधिश्वर जगतगुरू रामानुजाचार्य श्री श्री 1008 स्वामी हरिप़पन्नाचार्य जी महाराज ऊर्फ हरिहरानंद जी महाराज के चित्रों पर माल्यार्पण करके सनातन धर्म पद्धति से पुजन किया गया।
तत्पश्चात् पत्रकार, साहित्यकार एवं प्रतिभाशाली बच्चों को**नारायण की कलम *** सम्मान से सम्मानित किया गया।
सर्व प़थम सभी को माल्यार्पण कर अंगवस्त्रम एवं पेन तथा सुन्दरकाण्ड की पुस्तक देकर मुख्य अतिथि चुनार के सिनियर एडवोकेट भास्करानंद द्विवेदी के द्वारा सम्मानित किया गया।
महर्षि ऋष्य ऋ॑ग सेवा संस्थान (पंजी) ,नारायण गृहस्थ आश्रम नारायण , नगर पचरॉव के प़बन्धक ईन्जी बीरेंद्र कुमार सिंह उर्फ बिचित्रानन्द ने कहा कि जीवन में गुरू का बहुत बड़ा महत्व है।
मैं अपने आप को बहुत बड़ा भाग्यशाली मानता हूं कि हमें सद्गगुरू के रूप में एक बैचलर इन्जीनियरिग में इन्जीनियर गुरू के रूप में मिले हैं।
दुसरा चार वेद , छः शास्त्र , अट्ठारह पुराणों के तथा कितने रामायणो और उपनिषद के ज्ञ्याता प़खर विद्वान गुरू के रूप में मिले हैं।
जो भौतिक विज्ञान क्या कहता है और आध्यात्मिक विज्ञान क्या कहता है दोनों को पैरलल लेकर कथा का व्याख्यान करते हैं।
गृहस्थ जीवन जीने वाले को गृहस्थी आश्रम में रहने वाले गुरु से गुरू दीक्षा लेनी चाहिए।
गुरू के विना भोग और मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती।
चुनार के सिनियर एडवोकेट भास्करानंद द्विवेदी ने कहा कि सबसे बढ़िया जीवन गृहस्थ आश्रम में रहकर जीने का है इसमें रहकर दिनचर्या के साथ कामकाज करते हुए भगवान का सुमिरन करते रहना चाहिए।
बिचित्रानन्द ने बताया कि यह गुरू परम्परा हमें बरासत में मिली हुई है।
मेरे ग्यारह पुस्त पहले मेरे ग़ैन्ड दादा श्री का नाम था स्व भगवान सिंह ।
हमारे दादा श्री स्व अक्षैबर सिंह मास्टर थे । कितने छात्र गुरू पूर्णिमा के दिन गुड़, ककनी और रेवड़ी लेकर आते थे शिष्य आशीर्वाद लेने। मेरे पिता श्री स्व रामनारायण सिंह के गुरू श्री श्री 108 दंडी स्वामी ऋधेश्वरानन्द जी ऊर्फ दीन स्वामी थे ।पुरा जीवन गुरू परम्परा में बिता दिया यहां तक कि गृहस्थ जीवन में रहकर गेरूआ वस्त्र धारण कर लिए थे।मैं भी पिता श्री के आदर्श पर चलकर उनकी सेवा करके उनके नाम पर ही आश्रम बनाकर उनके आदर्शों पर चल रहा हूं बहुत आनन्द है कुछ दुःख भी है
जैसा कि किसी कवि ने कहा है कि –राही मनवा दुःख की चिन्ता क्यों सताती है दुःख तो अपना साथी है इसी सहारे जीवन जी रहा हूं।
सांसों का क्या भरोसा रूक जाय चलते चलते*
इस अवसर पर पत्रकार यासीन खांन, पत्रकार एवं साहित्य कार , पत्रकार अमित सिंह , पत्रकार शाहिद आलम, पत्रकार सुनील कुशवाहा तथा प्रतिभाशाली बच्चे सौरब त्रिपाठी पुत्र श्याम बिहारी त्रिपाठी पचराव को नारायण की कलम सम्मान से सम्मानित किया गया।
इस अवसर पर सुशील तिवारी, जय प़काश तिवारी , संजय मिश्रा , शिव कुमार पाण्डेय , भास्करानंद द्विवेदी , बासुदेव सिंह , सौरब त्रिपाठी, शराफत अली , शाहिद आलम , ए के सिंह , सुनील मौर्या , आदि लोग मुख्य रूप से उपस्थित थे।
संस्थान की अध्यक्षा श्रीमती सबिता सिंह ने सभी आंगन्तुको का आभार प्रकट किया।