

नरायनपुर ब्लॉक मे सफाईकर्मी बने हैं बाबू गांवों में गंदगी और बज बजा रही नालिया और कंप्यूटर के कुर्सी पर बैठे सफाई कर्मी !
नारायणपुर ब्लॉक में सफाई कर्मी एडीओ पंचायत कार्यालय में बना कंप्यूटर ऑपरेटर
सफाईकर्मी बने बाबू, गांवों में बजबजा रही गंदगी!”
चुनार, मीरजापुर।जहाँ नाव डूबी वहाँ मांझी गायब”— जिले के नरायनपुर ब्लॉक में सफाईकर्मी कंप्यूटर पर ऊँगलियाँ घुमा रहे हैं और गांवों में कूड़े-कचरे का साम्राज्य फैल चुका है। स्वच्छ भारत मिशन का सपना नेताओं के भाषणों और फाइलों में चमक रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि सफाईकर्मी अपने मूल कार्यस्थलों से नदारद हैं।
कंप्यूटर की कुर्सी पर सफाईकर्मी!
पंचायती राज विभाग की कारस्तानी इतनी धांसू है कि सफाईकर्मी अब गांवों की गलियों की बजाय ब्लॉक दफ्तर में सरकारी फाइलों की धूल झाड़ने में जुटे हैं। उदाहरण के तौर पर, सफाईकर्मी रवि कुमार प्रजापति को बल्लीपुर गांव में स्वच्छता की जिम्मेदारी दी गई थी, लेकिन सरकारी दस्तावेजों की कलाकारी देखिए— वे ब्लॉक मुख्यालय पर कंप्यूटर ऑपरेटर की भूमिका निभा रहे हैं! मजेदार बात यह है कि यह हाल अकेले रवि कुमार का नहीं है, बल्कि,प्रमोद सोनकर, अरुणोदय सिंह, राकेश धुरिया, प्रदीप पांडे सहित कई सफाईकर्मी ब्लॉक और तहसील कार्यालयों में जमे हुए हैं, और गांवों में गंदगी का अंबार लगा हुआ है।
बंदर के हाथ उस्तरा”— सरकारी तंत्र की लापरवाही!
सरकारी नियमों की किताबों में साफ-सुथरा तंत्र देखने को मिलता है, लेकिन जमीनी हकीकत में सब कुछ धूल-धूसरित हो चुका है। पंचायती राज विभाग और ब्लॉक प्रशासन की गजब की “व्यवस्था” देखिए— जो कर्मचारी गांव की नालियों की सफाई के लिए तैनात हैं, वे सरकारी फाइलों की सफाई कर रहे हैं। सवाल उठता है कि अगर कोई गोपनीय दस्तावेज लीक हुआ या सरकारी काम में कोई चूक हुई, तो जिम्मेदार कौन होगा? क्या अब सफाईकर्मियों से कंप्यूटर संचालन करवाना भी सरकार की नई कार्यशैली का हिस्सा बन चुका है?
गांवों में सफाई ठप, कूड़ा बोला “जय राम जी की”
जब सफाईकर्मी ही नदारद हैं, तो गांवों की हालत का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं। बल्लीपुर सहित आसपास के गांवों में नालियाँ बजबजा रही हैं, गंदगी का साम्राज्य फैला हुआ है, और बीमारियों का न्यौता खुलेआम बंट रहा है। दिलचस्प यह है कि इन “बाबू बने सफाईकर्मियों” को वेतन भी पूरा मिल रहा है, बिना झाड़ू उठाए, बिना कूड़ा हटाए! सवाल उठता है कि जब ये कर्मचारी ब्लॉक में तैनात हैं, तो प्रधान और पंचायत सचिव किस आधार पर इनका वेतन जारी कर रहे हैं? क्या सफाई का काम सिर्फ कागजों पर हो रहा है?
ऊँट के मुँह में जीरा”— स्वच्छ भारत मिशन की हालत!
सरकार के लाख दावों के बावजूद गांवों में सफाई व्यवस्था रसातल में जा चुकी है। स्वच्छ भारत मिशन का प्रचार-प्रसार तो जोर-शोर से किया जाता है, लेकिन सफाईकर्मियों को कंप्यूटर ऑपरेटर बना देने जैसी नीतियाँ इस मिशन को मजाक बनाकर रख रही हैं। अब देखना यह है कि जिलाधिकारी की नजर कब इस “ऑफिसिया सफाई अभियान” पर पड़ती है और कब ये सफाईकर्मी अपनी असली ड्यूटी यानी गांवों की सफाई करने लौटते हैं।
जब तक साहब बने ये सफाईकर्मी अपनी कुर्सियों से उठकर झाड़ू नहीं थामते, तब तक गांवों में गंदगी का किला ऐसे ही बुलंद रहेगा। सवाल यह है कि “जागेगा प्रशासन या यूं ही चलता रहेगा सफाईकर्मियों का यह ‘ऑफिसिया प्रमोशन’?”