यूपी 112 का खुला तमाशा: बिना मेडिकल के पत्रकार पर हमले को बता दिया ‘बाइक से गिरना’ चुनार पुलिस बनी डॉक्टर, जज और सफाई एजेंसी, ट्विटर पर मिनटों में लिख दिया फैसला

यूपी 112 का खुला तमाशा: बिना मेडिकल के पत्रकार पर हमले को बता दिया ‘बाइक से गिरना’ चुनार पुलिस बनी डॉक्टर, जज और सफाई एजेंसी, ट्विटर पर मिनटों में लिख दिया फैसला
चुनार,मिर्जापुर। उत्तर प्रदेश पुलिस 112 और चुनार थाना पुलिस की कार्यशैली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले पत्रकार पर कथित जानलेवा हमले के मामले में पुलिस ने ऐसी जल्दबाजी दिखाई, जिसने पूरे सिस्टम की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। आरोप है कि ना मेडिकल कराया गया, ना विधिक जांच की गई, ना घटनास्थल से साक्ष्य जुटाए गए, लेकिन सोशल मीडिया पर मिनटों में फैसला जरूर सुना दिया गया।
मामला 25 अप्रैल 2026 की रात करीब 9:13 बजे का बताया जा रहा है। स्थानीय पत्रकार बीरेन्द्र कुमार सिंह उर्फ बिचित्रानन्द शादी समारोह से लौट रहे थे। इसी दौरान चुनार-कछवा मार्ग स्थित 74 नंबर गेट के पास पहले से घात लगाए बैठे दो नकाबपोश बदमाशों ने उन्हें रोक लिया। पीड़ित के अनुसार, बदमाशों ने पहले कट्टा तानकर डराया, फिर तेजधार हथियार से हमला किया। इसके बाद उन्हें सड़क पर गिराकर लात-घूंसों से बेरहमी से पीटा गया। इतना ही नहीं, मोबाइल छीनने की भी कोशिश की गई।घायल पत्रकार ने तत्काल पुलिस से मदद मांगने की कोशिश की। कई बार फोन किया गया, लेकिन समय पर संपर्क न होने पर यूपी 112 पर सूचना दी गई। पीड़ित को उम्मीद थी कि पुलिस मौके पर पहुंचकर जांच करेगी, मेडिकल कराएगी, हमलावरों की तलाश करेगी और सुरक्षा देगी।लेकिन हुआ इसका उल्टा। आरोप है कि थाना चुनार पुलिस ने जांच की औपचारिकता निभाने के बजाय ट्विटर/एक्स पर पोस्ट डालकर पूरा मामला ही पलट दिया। पोस्ट में कहा गया कि पत्रकार बाइक से गिरकर घायल हुए हैं, शरीर पर हमले जैसी कोई स्पष्ट चोट नहीं है और लगाए गए आरोप असत्य व निराधार हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि बिना मेडिकल रिपोर्ट पुलिस ने चोट का कारण कैसे तय कर दिया? आखिर पुलिस कब से डॉक्टर बन गई? चोट गिरने से लगी, धक्का लगने से लगी, हथियार से लगी या मारपीट से लगी — यह तय करना डॉक्टर, मेडिकल बोर्ड और फोरेंसिक जांच का विषय है, न कि थाना स्तर पर ट्विटर पोस्ट का।
स्थानीय पत्रकारों और सामाजिक संगठनों में इस रवैये को लेकर भारी आक्रोश है। लोगों का कहना है कि जब एक पत्रकार की शिकायत को ही पुलिस इस तरह सोशल मीडिया पर झूठा बताने लगेगी, तो आम नागरिक की सुनवाई की क्या स्थिति होगी?
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जांच से पहले फैसला क्यों?
घायल पत्रकार का मेडिको लीगल परीक्षण नहीं कराया गया।घटनास्थल का वैज्ञानिक निरीक्षण नहीं हुआ।आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज नहीं खंगाली गई।आरोपी के कॉल डिटेल नहीं निकाली गई।संदिग्ध हमलावरों की पहचान के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं किया गया।मौके से खून, कपड़े, हथियार या अन्य साक्ष्य जुटाने की जानकारी सामने नहीं आई।यानी साफ तौर पर कहा जा रहा है कि जांच बाद में, सफाई पहले दी गई।
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कानून व्यवस्था पर बड़ा धब्बा
कानून कहता है कि शिकायत मिलने पर निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, लेकिन यदि पुलिस पहले ही शिकायतकर्ता को झूठा बताने लगे तो न्याय प्रक्रिया का क्या अर्थ रह जाता है? यह घटना सिर्फ एक केस नहीं, बल्कि पुलिस की संवेदनशीलता, जवाबदेही और पारदर्शिता की परीक्षा बन गई है। चुनार कोतवाल का कहना है कि बीरेंद्र कुमार सिंह उर्फ बिचित्रानन्द पत्रकार हैं ही नहीं।वह फ़ाड़ है।यह किस यन्त्र या मसीन से चेक किया।जब कोतवाल को पत्रकारों के बारे में ही नहीं पता है तब प़ेस रिलीज कैसे भेजता है।अन्धेर नगरी चौपट राजा वाली कहावत चुनार कोतवाल पर सटीक बैठ रही है
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सवाल
- क्या थाना अब अस्पताल और कोर्ट दोनों बन गया है?
- जांच से पहले ट्वीट करने की इतनी जल्दी क्यों थी?
- क्या किसी दबाव में मामले को दबाने की कोशिश हुई?
- अगर पीड़ित आम नागरिक होता तो क्या यही रवैया रहता?
- बिना मेडिकल रिपोर्ट पुलिस ने निष्कर्ष कैसे निकाला?